भारतीय वित्तीय बाजार (Indian financial market)
वित्तीय व्यवस्थाओं का संचालन वित्तीय बाजार एवं संस्थाओं (financial market and institutions) के द्वारा होता है भारतीय वित्तीय व्यवस्था को मुख्यता दो भागों में बांटा जाता है।

भारतीय वित्तीय बाजार के दो भाग है-
1. भारतीय मुद्रा बाजार (Indian money market)
2. भारतीय पूंजी बाजार (Indian capital market)
1. भारतीय मुद्रा बाजार (Indian money market)
भारतीय मुद्रा बाजार का संबंध मौद्रिक उपकरणों (financial instruments) के व्यापार से होता है। एक प्रभावी मौद्रिक नीति (Monetary policy) का आधार सुसंगठित मुद्रा बाजार होता है।
भारतीय मुद्रा बाजार में रिजर्व बैंक को केंद्रीय स्थिति प्राप्त है क्योंकि यह देश में साख का नियमन व नियंत्रण करता है समानता मुद्रा बाजार में व्यापारिक बिलों (Commercial bill ) प्रतिज्ञा पत्रों (Treasury bills) सरकारी बिलों (Government bill) मांग पर देय ऋणओ आदि का क्रय विक्रय व्यापक रूप से किया जाता है।
मुद्रा बाजार के उप-बाजार (Sub Markets of Money Market)
1- माँग मुद्रा बाजार (Call Money Market)
इस बाजार में जिस दर पर लेन-देन होता है उसे माँग दर कहा जाता है जो मुद्रा की माँग और आपूर्ति के आधार पर निर्धारित होती है। इसमें मुद्रा की माँग बहुत कम समय के लिए (प्रायः कुछ घण्टों से लेकर 14 दिनों तक) की जाती है।
2- वाणिज्यिक बिल बाजार (Commercial Bill Market)
यह अल्पकालीन स्वतरलता वाला तथा मोल-भाव युक्त बाजार है। इसका प्रयोग कृषि एवं औद्योगिक वस्तुओं, घरेलू एवं विदेशी वस्तुने को बाजार में लाने तथा भण्डारण के वित्तीयन हेतु किया जाता है। भारत में यह बाजार अभी भी अल्प विकसित अवस्था में है।
3- वाणिज्यिक प्रपत्र (Commercial Paper)
ये प्रमाण-पत्र पूँजी बाजार में सूचीबद्ध कम्पनियों द्वारा (जिनको कार्यकारी पूँजी 5 करोड़ रुपये से अधिक हो) 25 लाख रुपये के (1) गुणकों में जारी किए जाते हैं। ये न्यूनतम 1 करोड़ रुपये व परिपक्वता अवधि (Maturity Period) 7 से 90 दिनों तक के लिए जारी किए जाते हैं। भारत में इनकी शुरुआत वर्ष 1990 में की गई थी।
4- जमा प्रमाण-पत्र (Deposit Certificates)
जमा प्रमाण पत्र, एक विशिष्ट विनिमय योग्य वित्तीय प्रपत्र होते हैं, जो बैंक द्वारा अपने पास जमा की गई मुद्रा के बदले जमाकर्ता को जारी किए जाते हैं। जमा प्रमाण पत्र 1 लाख रुपये अथवा इसके गुणक (Multiples) में जारी किए जाते हैं। इसकी परिपक्वता अवधि बैंकों के संबंध में न्यूनतम 7 दिन तथा अधिकतम एक वर्ष, जबकि अन्य वित्तीय संस्थाओं के सम्बंध में न्यूनतम 1 वर्ष तथा अधिकतम 3 वर्ष होती है।
5- कोषागार बिल बाजार (Treasury Bill Market)
कोषागार बिल अल्पकालिक प्रतिभूतियाँ हैं जिनके माध्यम से सरकार उधार लेती है। इनका निर्गमन सरकार के लिए भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा किया जाता है।
ट्रेजरी बिल वर्तमान में तीन परिपक्वता अवधि अर्थात् 91 दिन, 182 दिन और 364 दिन के लिए जारी किए जाते हैं।
ट्रेजरी बिल शून्य कूपन प्रतिभूतियाँ हैं, इन पर कोई ब्याज नहीं दिया जाता। ट्रेजरी बिल छूट पर जारी किए जाते हैं और परिपक्वता के समय इन्हें अंकित मूल्य पर भुनाया जाता है।
2. भारतीय पूंजी बाजार (Indian capital market)
पूंजी बाजार (Capital market) भारतीय वित्तीय प्रणाली का महत्वपूर्ण अंग है। यह दीर्घकालीन कोषों से सम्बन्धित बाजार है. जहाँ ऋण व अंशपत्रों (Equity) के माध्यम से पूँजी का दीर्घकालीन व्यापार होता है।
पूंजी बाजार के प्रकार (Types of Capital Market)
पूँजी बाजार को दो भागों में बाँटा जा सकता है-
(i) प्राथमिक बाजार (Primary Market)
प्राथमिक बाजार के अन्तर्गत प्रतिभूतियों का पहली बार विक्रय किया जाता है अर्थात् यह नए निर्गमनों (New Issues) या अंश (Share) से सम्बंधित बाजार है जहाँ कोषों की गतिशीलता सदैव नई प्रतिभूतियों के माध्यम से होती है।
प्राथमिक बाजार में घरेलू व विदेशी दोनों प्रकार के कोषों की उगाही की जा सकती है तथा इसमें निर्गमित प्रतिभूतियाँ, समता अंश (Equity Share) या ऋण प्रपत्र (Debenture) दोनों हो सकते हैं।
(ii) द्वितीयक बाजार (Secondary Market)
वह बाजार, जिसके अन्तर्गत पुरानी अर्थात् पूर्व में जारी की गई प्रतिभूतियों का व्यापार होता है, द्वितीयक बाजार (Secondary Market) कहलाता है। द्वितीयक बाजार के अन्तर्गत पँजीकृत (Registered) स्टॉक एक्सचेंज आते हैं।
द्वितीयक बाजार या स्टॉक एक्सचेन्ज में उन्हीं प्रतिभूतियों, समता अंश या ऋण पत्रों का क्रय-विक्रय होता है, जो स्टॉक मार्केट में सूचीबद्ध (listed) होते हैं। यहाँ सूचीबद्धता का आशय किसी मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेन्ज द्वारा प्रतिभूतियों (Securities) को व्यापार के लिए स्वीकार किए जाने से है। इसे शेयर बाजार के नाम से भी जाना जाता है।
वास्तव में एक सक्रिय द्वितीयक बाजार, प्राथमिक बाजार की विकास प्रक्रिया को अपेक्षाकृत अधिक सुविधाजनक बनाता है, क्योंकि यह प्राथमिक बाजार में अंशों व ऋण-पत्रों को तरलता प्रदान करने हेतु सतत् बाजार का कार्य करता है।
द्वितीयक बाजार के अन्तर्गत, प्राथमिक बाजार में शामिल संस्थाओं; व्यापारिक बैंकर्स, पारम्परिक कोष (Mutual Fund), वित्तीय संस्थान व व्यक्तिगत निवेशकों (Investors) के अतिरिक्त शेयर दलाल (Share Agents) भी शामिल होते हैं। ये शेयर दलाल, शेयर बाजार के सदस्य होते हैं और इन्हीं के माध्यम से शेयरों का क्रय-विक्रय होता है।
कंपनी द्वारा जो शेयर जारी किये जाते हैं, उन्हें खरीदा या बेचा जा सकता है, परंतु यह तभी संभव हो सकता है, जब कंपनी BSE (Bombay Stock Exchange) या NSE (National Stock Exchange) में सूचीबद्ध हो। कंपनी के सूचीबद्ध होने के बाद की प्रक्रिया द्वितीयक बाजार के अन्तर्गत होती है। सूचीबद्ध होने का तात्पर्य है, जिस व्यक्ति को शेयर बेचा जाए वह शेयर को क्रय-विक्रय करने के लिए प्राधिकृत (Authorized) हो।
नोट– शेयर बाजार में निवेश से पहले, उच्च जोखिम को समझना जरूरी है। बाजार में उतार-चढ़ाव सामान्य है, जिससे नुकसान हो सकता है। पर्याप्त जानकारी किये बिना किसी भी योजना में निवेश न करें।
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